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Mahamedia Magazine - November 2019


Mahamedia Magazine - November 2019
'परम्परा समाज की एक सामूहिक विरासत है जो कि सामाजिक संगठन के सभी स्तरों में व्याप्त होती है, उदाहरण के लिए मूल्य- व्यवस्था सामाजिक संरचना और व्यक्तित्व की संरचना। इस प्रकार परम्परा सामाजिक विरासत को कहा जाता है इस सामाजिक विरासत के तीन तत्व हैं- मूल्यों की व्यवस्था, सामाजिक संरचना और उसके परिणामस्वरूप व्यक्तित्व की संरचना।' यह परम्परा का समाजशास्त्रीय अर्थ है। इसके अतिरिक्त भी परम्परा को अनेक अर्थ दिए गए हैं जैसे- अर्थ यात्मशास्त्रीय अर्थ अथवा ऐतिहासिक अर्थ। परम्परा का समाजशास्त्रीय अर्थ सामाजिक सांस्कृतिक और कार्यात्मक होता है।
अध्यात्मशास्त्रीय अथवा दार्शनिक दृष्टि से परम्परा से तात्पर्य उन सत्यों से है जो अति प्राचीन काल में अभिव्यक्त हुए थे और जो शाश्वत सत्य हैं। इन सत्यों में आध्यात्मिक एकता पाई जाती है। ऐतिहासिक दृष्टि से प्रत्येक परम्परा उद्विकास के बाद पतन की सीढ़ी पर पहुँचती है। परम्परा आध्यात्मिक शक्तियों में निहित होती है जो कि मानव शक्तियों से परे होती हैं, इसलिए उसका विकास भी दैवी भारत में परम्परा और आधुनिकता की समस्या को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि आधुनिकता क्या है। आधुनिकता की धारणा पश्चिमी देशों की आधुनिक प्रगति विशेषतया संयुक्त राज्य अमरीका अथवा ब्रिटेन की सामाजिक संरचना के नमूने के आधार पर बनाई-गई है।
परम्परा का ऐतिहासिक अर्थ ऐतिहासिक दर्शन पर आधारित है। इसमें यथा सम्भव अनुभवात्मक और वस्तुगत दृष्टिकोण ग्रहण करने का प्रयास किया जाता है। परम्परा के अध्यात्मशास्त्रीय और ऐतिहासिक दोनों ही अर्थ समाजशास्त्र की दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। समाजशास्त्र में परम्परा का सामाजिक सांस्कृतिक अथवा कार्यात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाता है परम्परा यह अर्थ अपेक्षाकृत आधुनिक काल में विकसित हुआ है। किसी भी समाज में संस्कृति में समान विकास होता रहता है, फिर भी कुछ मूल्य, संस्थाएँ और सामाजिक संरचना के कुछ अंग न्यूनाधिक रूप से स्थायी बने रहे हैं। इन्हें ही परम्परा कहा जा सकता है। परम्परा का यह प्रत्यय भारतवर्ष में परम्परागत संस्कृति के विवेचन से और भी अधिक स्पष्ट होगा।
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