"Brahmachari Girish Ji Honoured at Dharma Sanskriti Mahakumbha 2016"
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Mahamedia Magazine - July 2019


Mahamedia Magazine - July 2019
कबीर का एक पद है जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर गुरु और ईश्वर दोनों एक साथ सामने खड़े हों तो किसके पैर पहले छूना चाहिए। वे स्वयं ही प्रश्न करते हैं और उत्तर भी स्वयं ही देते हैं कि मैं तो गुरु के चरणों में ही प्रणाम करूंगा। उन्हीं को महत्व दूंगा क्योंकि वे नहीं होते तो मुझे ईश्वर की पहचान कौन कराता |
साधना के क्षेत्र में गुरु को भगवान से भी अधिक महत्व दिया गया है, क्योंकि उनके अनुग्रह के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता। जीवन रहस्यों का उद्घाटन केवल गुरु ही करने में सक्षम होते हैं। जिस प्रकार नेत्रहीन व्यक्ति को संसार का अनुपम सौन्दर्य दिखाई नहीं दे सकता, उसी प्रकार जब तक गुरु हमें प्रकाश नहीं देगा, उसका मार्गदर्शन हमें नहीं मिलेगा, तब तक आंखें रहते हुए भी हमें चारों ओर अंधकार ही नजर आएगा। हम सही मार्ग पर नहीं चल सकेंगे।
परमपूज्य स्वामी ब्रह्मानंद जी सरस्वती महर्षि जी के गुरू थे और उन्हीं के ज्ञान और आशीर्वाद से महर्षि जी सम्पूर्ण विश्व को यह अनोखी अनुभूति दे सके। महर्षि महेश योगी की मान्यता थी कि जीवन का विज्ञान और जीने की कला हमें प्राचीन काल के वैदिक ऋषियों ने समग्र जीवन जीने के लिए व्यवहारिक ज्ञान के रूप में सिखाई थी। अब वेद हमारे सनातन ज्ञान के प्रकाशस्तंभ हैं जो हमें कर्म के चरमोत्कर्ष तक पहुंचा कर अंतत: मोक्ष लाभ कराते हैं। सृष्टि की विभिन्नता उसी गोचर- अगोचर सर्वव्यायी की देन है। वह वेद-प्रदत्त प्रज्ञा सार्वकालिक और सार्वभौतिक है। अब हमें इस पश्चिम द्वारा प्रदत्त वैज्ञानिक चिंतन के परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है।
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